गाँधी और राष्ट्रभाषा हिन्दी ( Gandhi aur Rashtrabhasha Hindi )
Auteur : डॉ. सुनीता कुमारी चौरसिया ( Dr. Sunita Kumari Chourasiya )
Date de publication : 2021-11-25
Éditeur : Kalpana Prakashan
Nombre de pages : 304
Résumé du livre
राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास में गाँधी का योगदान अभूतपूर्व रहा। ऐसा नहीं है कि भारत आकर ही महात्मा गाँधी राष्ट्रभाषा आन्दोलन से जुडे़ हैं । उनको यह विदित था कि हिन्दी की प्रकृति प्रारंभ से ही सार्वदेशिक है। भारतीय भाषाओं के प्रति गाँधीजी का लगाव भारत आने से पहले दक्षिण अफ्रीका के पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ (1906) में उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए हिन्दी भाषा को मीठी, नम्र ओर ओजस्वी स्वीकार किया । गाँधीजी अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में स्वराज्य के लिए अंग्रेजी शिक्षा के बारे में लिखते हैं कि करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली है, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं। गाँधीजी स्वराष्ट्र के लिए स्वभाषा के पक्षधर थे, अंग्रेजी का सवाल कहाँ उठता है। वे कहते हैं कि आपको¨ समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म, बैर बढे़ हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं तो उसका हम पर जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं।